समंदर बनेगा काल! तक दुनिया के नक्शे से गायब हो सकते हैं ये शहर, NASA का बड़ा अलर्ट
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में पृथ्वी के कई हिस्सों का भूगोल बदल सकता है। इसी बीच अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के समुद्र-स्तर संबंधी अध्ययनों ने यह संकेत दिया है कि वर्ष 2050 तक दुनिया के कई तटीय क्षेत्रों में समुद्र का जलस्तर उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकता है। इससे बाढ़, तटीय कटाव और तूफानों के दौरान होने वाले नुकसान में भारी वृद्धि होने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वैज्ञानिक रिपोर्टों में यह नहीं कहा गया है कि वर्ष 2050 तक पूरे शहर अचानक समुद्र में गायब हो जाएंगे। बल्कि निष्कर्ष यह है कि समुद्र का बढ़ता स्तर कई तटीय शहरों के निचले इलाकों में बार-बार बाढ़, स्थायी जलभराव और बुनियादी ढांचे पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे भविष्य की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक मान रहे हैं।
क्या कहती हैं वैज्ञानिक रिपोर्टें?
NASA, अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) और अन्य शोध संस्थानों के संयुक्त विश्लेषण के अनुसार यदि वर्तमान गति से जलवायु परिवर्तन जारी रहा तो वर्ष 2050 तक अमेरिका के कई तटीय इलाकों में समुद्र का स्तर औसतन लगभग 25 से 30 सेंटीमीटर (करीब 1 फुट) तक बढ़ सकता है। अलग-अलग क्षेत्रों में यह वृद्धि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कम या अधिक हो सकती है।
समुद्र के बढ़ते स्तर का सबसे बड़ा असर उन शहरों पर पड़ेगा जो पहले से ही समुद्र के बेहद करीब बसे हैं और जहां हाई टाइड तथा तूफानों के दौरान जलभराव की समस्या मौजूद है।
किन इलाकों पर सबसे अधिक खतरा?
वैज्ञानिकों के अनुसार अमेरिका का गल्फ कोस्ट (Gulf Coast) सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है। यहां समुद्र का स्तर औसतन 14 से 18 इंच तक बढ़ने की संभावना जताई गई है।
इस क्षेत्र में स्थित न्यू ऑरलियंस, ह्यूस्टन, टाम्पा और मोबाइल जैसे शहर पहले से ही समुद्री तूफानों और बाढ़ का सामना करते रहे हैं। यदि समुद्र का स्तर लगातार बढ़ता रहा तो इन शहरों के निचले हिस्सों में नियमित जलभराव, सड़कों को नुकसान, बंदरगाहों पर असर और आवासीय क्षेत्रों में बाढ़ की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
फ्लोरिडा और दक्षिण-पूर्वी अमेरिका पर भी खतरा
फ्लोरिडा, जॉर्जिया और साउथ कैरोलाइना के तटीय इलाकों को भी वैज्ञानिक अत्यधिक संवेदनशील मान रहे हैं। इन क्षेत्रों में समुद्र का बढ़ता जलस्तर भविष्य में आने वाले तूफानों को और अधिक विनाशकारी बना सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समुद्र पहले से ऊंचे स्तर पर होगा तो सामान्य हाई टाइड भी कई इलाकों में बाढ़ का कारण बन सकती है। इससे स्थानीय आबादी, पर्यटन उद्योग और परिवहन व्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है।
न्यूयॉर्क, मियामी और बोस्टन की चुनौती
अमेरिका के पूर्वी तट पर स्थित न्यूयॉर्क, बोस्टन, मियामी और नॉरफोक जैसे शहर पहले से ही हाई टाइड फ्लडिंग यानी ऊंची ज्वार के दौरान जलभराव की समस्या का सामना कर रहे हैं।
यदि समुद्र का स्तर आने वाले वर्षों में अनुमान के अनुसार बढ़ता है तो इन शहरों में बाढ़ की घटनाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक बार हो सकती हैं। नॉरफोक में स्थित अमेरिकी नौसेना का बड़ा बेस भी भविष्य में समुद्री जलस्तर बढ़ने के कारण चुनौतियों का सामना कर सकता है।
पश्चिमी तट पर अपेक्षाकृत कम असर
वैज्ञानिकों के अनुसार अमेरिका के पश्चिमी तट पर समुद्र का स्तर अपेक्षाकृत कम गति से बढ़ने का अनुमान है। लॉस एंजेलिस, सैन फ्रांसिस्को और सिएटल जैसे शहरों में भी प्रभाव देखने को मिलेगा, लेकिन यहां अनुमानित वृद्धि पूर्वी और दक्षिणी तटीय क्षेत्रों की तुलना में कम हो सकती है।
इसके बावजूद विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि समुद्र का थोड़ा-सा बढ़ा स्तर भी शक्तिशाली तूफानों के समय बड़े नुकसान का कारण बन सकता है।
चांद की कक्षा और हाई टाइड का क्या है संबंध?
वैज्ञानिकों ने एक और रोचक लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है। चंद्रमा की कक्षा में लगभग हर 18.6 वर्ष में एक प्राकृतिक परिवर्तन (Lunar Nodal Cycle) होता है। इस दौरान कुछ वर्षों तक समुद्री ज्वार अपेक्षाकृत अधिक ऊंचे हो सकते हैं।
NASA के वैज्ञानिकों का कहना है कि 2030 के दशक में यह प्राकृतिक चक्र फिर सक्रिय होगा। यदि उस समय तक समुद्र का स्तर पहले से ऊंचा हो चुका होगा, तो सामान्य हाई टाइड भी कई तटीय इलाकों में बार-बार बाढ़ ला सकती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि चंद्रमा कोई नई आपदा पैदा करेगा, बल्कि पहले से बढ़े समुद्र स्तर के कारण उसका प्राकृतिक प्रभाव अधिक दिखाई देगा।
समुद्र का स्तर क्यों बढ़ रहा है?
वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं—
ग्लोबल वार्मिंग के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों और पर्वतीय ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना।
समुद्री जल का गर्म होकर फैलना (Thermal Expansion)।
लगातार बढ़ता ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन।
NASA के सैटेलाइट मिशन, जिनमें Sentinel-6 Michael Freilich सहित अन्य समुद्री निगरानी प्रणालियां शामिल हैं, पिछले कई वर्षों से समुद्र के स्तर में हो रहे बदलावों का लगातार अध्ययन कर रही हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि वैश्विक औसत समुद्री स्तर लगातार बढ़ रहा है।
क्या पूरी दुनिया को होना चाहिए सतर्क?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह चेतावनी केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। दुनिया के लगभग सभी तटीय देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत, बांग्लादेश, मालदीव, इंडोनेशिया, फिलीपींस और प्रशांत महासागर के कई द्वीपीय देशों में भी समुद्र के बढ़ते स्तर को लेकर लंबे समय से अध्ययन किए जा रहे हैं। कई देशों ने पहले ही तटीय सुरक्षा परियोजनाएं, समुद्री दीवारें और बाढ़ नियंत्रण योजनाएं शुरू कर दी हैं।
क्या 2050 तक शहर पूरी तरह डूब जाएंगे?
यह दावा कि वर्ष 2050 तक कई बड़े शहर पूरी तरह समुद्र में समा जाएंगे, वैज्ञानिक रिपोर्टों की सटीक व्याख्या नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविक खतरा बार-बार आने वाली बाढ़, तटीय कटाव, जलभराव, बुनियादी ढांचे को नुकसान और लोगों के विस्थापन का है।
कुछ निचले इलाके भविष्य में स्थायी रूप से रहने योग्य नहीं रह सकते, लेकिन पूरे शहरों के अचानक गायब हो जाने जैसी स्थिति का दावा वर्तमान वैज्ञानिक अध्ययनों से सीधे तौर पर सिद्ध नहीं होता।
क्या किया जा सकता है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम किया जाए, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाए और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए समय रहते योजनाएं बनाई जाएं तो भविष्य के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इसके अलावा सरकारों को शहरी नियोजन, बाढ़ प्रबंधन, समुद्री सुरक्षा ढांचे और जलवायु अनुकूल विकास पर तेजी से काम करने की आवश्यकता होगी।
NASA और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के अध्ययन यह संकेत देते हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की चुनौती बन चुका है। समुद्र का बढ़ता स्तर आने वाले वर्षों में दुनिया के कई तटीय शहरों के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। हालांकि वर्ष 2050 तक पूरे शहरों के अचानक समुद्र में डूब जाने जैसे दावों की पुष्टि वैज्ञानिक रिपोर्टें नहीं करतीं। वास्तविक खतरा लगातार बढ़ती तटीय बाढ़, जलभराव, तटीय कटाव और बड़े पैमाने पर आर्थिक एवं सामाजिक नुकसान का है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी से प्रभावी जलवायु नीतियां अपनाई जाएं और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित किया जाए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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